Rural Livelihoods promoted by Jeevika Madhubani

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Our journey of linking household with better livelihoods option began from Rajnagar block but now having its reach in all 21 block of Madhubani district. we are a group of professional working day and night to ensure that most vulnerable households of rural area get linked with more than one livelihood source for sustainable and continuous earning.

12/09/2024
A livelihood way
11/06/2022

A livelihood way

09/11/2021

बिहार के लोक आस्था के महापर्व छठ के महात्य के बारे में शेयर की गई वृतांत, जो निम्न है:-

दीपावली के ठीक छः दिन बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को "सूर्य षष्ठी का व्रत" करने का विधान है।

छठे दिन होने के कारण इसे आम बोलचाल में छठ पर्व कहा जाने लगा । इस दिन भगवान सूर्य व षष्ठी देवी की पूजा की जाती है।
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कहते हैं दुनिया उगते सूरज को हमेशा पहले नमन करती है, लेकिन बिहार के लोगो के लिए ऐसा नहीं हैं। बिहार के लोक आस्था से जुड़े पर्व “छठ” का पहला अर्घ्य डूबते हुए सूरज को दिया जाता हैं। इस पर्व की खास परंपरा है लोग झुके हुए को पहले सलाम करते हैं, और उठे हुए को बाद में। लोक आस्था का कुछ ऐसा ही महापर्व हैं “छठ”।

इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।
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सामूहिकता का हैं प्रतीक: -

सामूहिकता के मामले में बिहारियों का यह पर्व पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा। एक ऐसी मिशाल जो ना केवल आस्था से भरा हैं, बल्कि भेदभाव मिटाकर एक होने का सन्देश भी दे रहा हैं। एक साथ समूह में जल में खड़े हो भगवान् भाष्कर की अर्चना सभी भेदभाव को मिटा देती हैं। भगवान् आदित्य भी हर सुबह यहीं सन्देश लेकर आते हैं, कि किसी से भेदभाव ना करो, इनकी किरणे महलों पर भी उतनी ही पड़ती हैं जितनी की झोपडी पर। इनके लिए ना ही कोई बड़ा हैं ना ही कोई छोटा, सब एक समान हैं। भगवान् सूर्य सुख और दुःख में एक सामान रहने का सन्देश भी देता हैं। इन्ही भगवान् सूर्य की प्रसन्नता के लिए हम छठ पूजा मनाते हैं।
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मैया हैं छठ फिर क्यों होती हैं सूर्य की पूजा:-

व्याकरण के अनुसार छठ शब्द स्त्रीलिंग हैं इस वजह से इसे भी इसे छठी मैया कहते हैं। वैसे किवदंती अनके हैं कुछ लोग इन्हें भगवान सूर्य की बहन मानते हैं तो कुछ लोग इन्हें भगवान सूर्य की माँ, खैर जो भी आस्था का ये पर्व हमारे रोम रोम में बसा होता हैं। छठ का नाम सुनते ही हमारा रोम-रोम पुलकित हो जाता हैं और हम गाँव की याद में डूब जाते हैं। इसे करने वाली स्त्रियाँ धन-धान्य, पति-पुत्र तथा सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहती हैं।
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दुनिया का सबसे कठिन व्रत:-

चार दिनों यह व्रत दुनिया का सबसे कठिन त्योहारों में से एक हैं। यह व्रत बड़े नियम तथा निष्ठा से किया जाता है। पवित्रता की इतनी मिशाल की व्रती अपने हाथ से ही सारा काम करती हैं। नहाय-खाय से लेकर सुबह के अर्घ्य तक व्रती पूरे निष्ठा का पालन करती हैं। भगवान भास्कर को 36 घंटो का निर्जल व्रत स्त्रियों के लिए जहाँ उनके सुहाग और बेटे की रक्षा करता हैं। वही भगवान् सूर्य धन, धान्य, समृधि आदि पर्दान करता हैं।
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सूर्यषष्ठी-व्रत के अवसर पर सायंकालीन प्रथम अर्घ्य से पूर्व मिट्टी की प्रतिमा बनाकर षष्ठीदेवी का आवाहन एवं पूजन करते हैं। पुनः प्रातः अर्घ्य के पूर्व षष्ठीदेवी का पूजन कर विसर्जन कर देते हैं। मान्यता है कि पंचमी के सायंकाल से ही घर में भगवती षष्ठी का आगमन हो जाता है.
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व्रत का पहला दिन नहाय खाय:-

पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन व्रती कद्दू/लौकी/दूधी की सब्जी, चने की दाल, और अरवा चावल का भात खाती हैं।
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व्रत का दूसरा दिन लोहंडा और खरना:-

दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को व्रती गन्ने के रस की खीर बनाकर देवकरी में पांच जगह कोशा (मिट्टी के बर्तन) में खीर रखकर उसी से हवन किया जाता है। इसे ‘खरना’ कहा जाता है।
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खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसके बाद 36 घंटे का निर्जला (बिना अन्न-जल) उपवास रखा जाता है।
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व्रत का तीसरा दिन संध्या अर्घ्य:-

तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी या खजूर भी कहते हैं (ठेकुआ पर लकडी के साँचे से सूर्यभगवान्‌ के रथ का चक्र भी अंकित करना आवश्यक माना जाता है), के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा सभी प्रकार के मौसमी फल ईंख, केले, पानीफल सिंघाड़ा, शरीफ़ा, नारियल, मूली, सुथनी, अदरक, गागर नींबू, अखरोट, बादाम, इलायची, लौंग, पान, सुपारी एवं अन्य समान अर्घपात (लाल रंग का), धगगी, लाल/पीले रंग का कपड़ा, एक बड़ा घड़ा जिस पर बारह दीपक लगे हो, गन्ने के बारह पेड़ आदि। आदि छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।
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शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है।
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छठ पूजा में कोशी भरने की मान्यता है अगर कोई अपने किसी अभीष्ट के लिए छठ मां से मनौती करता है तो वह पूरी करने के लिए कोशी भरी जाती है. नदी किनारे गन्ने का एक समूह बना कर छत्र बनाया जाता है उसके नीचे पूजा का सारा सामान रखा जाता है। इस प्रकार भगवान्‌ सूर्य के इस पावन व्रत में शक्ति और ब्रह्म दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है । इसीलिये लोक में यह पर्व ‘सूर्यषष्ठी’ के नाम से विख्यात है।
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वर्त का चौथा दिन उषा अर्घ्य:-

चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती वहीं पुनः इकट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। अंत में व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर लोक आस्था का महापर्व छठ का समापन करते हैं।
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1. ऐसा कहा जाता है की छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर (तालाब) के किनारे यह पूजा की जाती है।
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2. - ऐसा भी कहा जाता है कि भगवान राम के वनवास से लौटने पर राम और सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन उपवास रखकर भगवान सूर्य की आराधना की और सप्तमी के दिन व्रत पूर्ण किया। पवित्र सरयू के तट पर राम-सीता के इस अनुष्ठान से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य देव ने उन्हें आशीर्वाद दिया था।
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3. - एक अन्य मान्यता के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हारकर जंगल-जंगल भटक रहे थे, तब इस दुर्दशा से छुटकारा पाने के लिए द्रौपदी ने सूर्यदेव की आराधना के लिए छठ व्रत किया। इस व्रत को करने के बाद पांडवों को अपना खोया हुआ वैभव पुन: प्राप्त हो गया था।
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4. - ऐसा भी कहा जाता है कि स्वयंभू मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत को अधिक समय बीत जाने के बाद भी कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई। तदुपरांत महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी को चारू (प्रसाद) दिया, जिससे गर्भ तो ठहर गया, किंतु मृत पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रियवत उस मृत बालक को लेकर श्मशान गए। पुत्र वियोग में प्रियवत ने भी प्राण त्यागने का प्रयास किया। ठीक उसी समय मणि के समान विमान पर षष्ठी देवी वहां आ पहुंची। मृत बालक को भूमि पर रखकर राजा ने उस देवी को प्रणाम किया और पूछा- हे सुव्रते! आप कौन हैं?

देवी ने आगे कहा:-

तुम मेरा पूजन करो और अन्य लोगों से भी कराओ। इस प्रकार कहकर देवी षष्ठी ने उस बालक को उठा लिया और खेल-खेल में उस बालक को जीवित कर दिया। राजा ने उसी दिन घर जाकर बड़े उत्साह से नियमानुसार षष्ठी देवी की पूजा संपन्न की। चूंकि यह पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को की गई थी, अत: इस विधि को षष्ठी देवी/छठ देवी का व्रत होने लगा.

यह है इस व्रत का वृतांत ।
अपनी संस्कृति को जाने और अन्य को भी बतायें।

Practice to move against poverty
20/07/2021

Practice to move against poverty

01/06/2021

12 टन की कीमत।
केन्या द्वारा भेजे गए 12 टन अनाज पर बहुत से लोग मज़ाक उड़ा रहे है। सोशल मीडिया पर केन्या को "भिखारी, भिखमंगा, गरीब" आदि आदि कहा जा रहा है। अब एक छोटा सा वाक़या सुनिए।
आपने अमरीका का नाम सुना होगा, मैनहैटन का भी, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का भी और ओसामा बिन लादेन का भी। जो ज़्यादातर लोगों ने नहीं सुना होगा वो है 'इनोसाईन गाँव' जो पड़ता है केन्या और तंजानिया के बॉर्डर पर और यहाँ की लोकल जनजाति है 'मसाई'।

अमेरिका पर हुए 9/11 के हमले की ख़बर मसाई लोगों तक पहुचने में कई महीने लग गए। ये ख़बर उन तक तब पहुँची जब उनके गाँव के पास के ही कस्बे में रहने वाली, स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी की मेडिकल स्टूडेंट किमेली नाओमा छुट्टियों में वापस केन्या आयी और वहाँ की लोकल जनजाति मसाई को 9/11 का आंखों देखा हाल सुनाया।
कोई बिल्डिंग इतनी ऊंची हो सकती है कि वहाँ से गिरने पर जान चली जाए, झोपड़ी में रहने वाले मसाई लोगों के लिए ये बात अविश्वसनीय थी मगर फिर भी उन लोगों ने अमरीकियों के दुःख को महसूस किया और उसी मेडिकल स्टूडेंट के माध्यम से केन्या की राजधानी नैरोबी में अमेरिकी दूतावास के डिप्टी चीफ़ विलियम ब्रांगिक को एक पत्र भिजवाया जिसे पढ़ने के बाद विलियम ब्रांगिक ने पहले हवाई जहाज का सफर किया, उसके बाद कई मील तक टूटी फूटी सड़क पर कठिनाई का रास्ता पर करते हुए मसाई जनजाति के गाँव पहुँचे।

गाँव पहुँचने पर मसाई जनजाति के लोग इक्कट्ठा हुए और एक कतार में 14 गायें ले कर अमरीकी दूतावास के डिप्टी चीफ़ के पास पहुँचे। मसाईयों के एक बुज़ुर्ग ने गायों से बंधी रस्सी डिप्टी चीफ़ के हांथों पे पकड़ाते हुए एक तख़्ती की तरफ इशारा कर दिया। जानते हैं उस तख़्ती पर क्या लिखा था? लिखा था- "इस दुःख की घड़ी में अमरीका के लोगों की मदद के लिए हम ये गायें उन्हें दान कर रहे हैं"। जी हाँ, उस पत्र को पढ़ कर दुनियाँ के सबसे ताकतवर और समृद्धि देश का राजदूत सैकड़ो मील चल कर चौदह गायों का दान लेने आया था।

गायों के ट्रांसपोर्ट की कठिनाई और कानूनी बाध्यता के कारण गायें तो नहीं जा पायीं मगर उनको बेंचकर एक मसाई आभूषण ख़रीद कर 9/11 मेमोरियल म्यूजियम में रखने की पेशकश की गई। जब ये बात अमरीका के आम नागरिकों तक पहुँची तो पता है क्या हुआ? उन्होंने आभूषण की जगह गाय लेने की ज़िद्द कर दी। ऑनलाइन पिटीशन साइन किये गए की उन्हें आभूषण नहीं गाय ही चाहिए, अधिकारियों को ईमेल लिखे गए, नेताओं से बात की गई और करोड़ों अमरीका वासियों ने मसाई जनजाति और केन्या के लोगों को इस अभूतपूर्व प्रेम के लिए कृतज्ञ भाव से धन्यवाद दिया, उनका अभिनंदन किया।

12 टन सामग्री सहर्ष स्वीकार । दान नहीं, दानी का हृदय देखिये, कंकड़ नहीं, कंकड़ उठा कर सेतु में लगाने वाली गिलहरी की श्रद्धा देखिये। #धन्यवाद केन्या

30/04/2021

ऋग्वेद पर सबसे पहला भाष्य किसने और कब लिखा यह निश्चित नही है, परन्तु वर्तमान मे उपलब्ध भाष्यों मे सबसे पहला भाष्य स्कन्द स्वामी विचिरित प्राप्त होता है ।

इतिहास के ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि वेदों के अर्थ समझने और समझाने की प्रवृत्ति विशेष रूप से कुमारिल भट्ट और शंकर के समय से जागरूक हुई। स्कन्द स्वामी का अभिर्भाव काल यही माना जाता है। यह समय वि० सं०६८२ अर्थात ६२४ ई० के आस पास का होना चाहिए क्योंकि ऐसी प्रसिद्धि है कि शतपथ ब्राह्मण के प्रसिद्ध भाष्यकार हरि स्वामी (६३८ई०) को स्कन्द स्वामी ने अपना ऋग्भाष्य पढाया था-

व्याख्यां कृत्वाआध्यापयन्मां श्रीस्कन्दस्वाम्यस्ति मे गुरू:।

ऋग्वेद भाष्य के प्रथमाष्टक के अन्त से प्राप्त श्लोक से पता चलता है कि स्कन्द स्वामी गुजरात की तत्कालीन राजधानी वलभी के रहने वाले थे, तथा इनके पिता का नाम भर्तृध्रुव था--

वलभी विनिवा स्येतामृगर्थागमसंहतिम्
भर्तृध्रुवसुतश्चक्रे स्कन्दस्वामी यथास्मृतिः।

स्कन्द स्वामी के इस भाष्य का पर्याप्त प्रभाव सायण पर भी पडा है। स्कन्द स्वामी का यह भाष्य सम्पूर्ण ऋग्वेद पर उपलब्ध नही होता। ऐसी मान्यता है कि स्कन्द स्वामी ने अपना भाष्य आधे ऋग्वेद ( चार अष्टक) पर ही लिखा था शेष भाग को नारायण एवं उदगीथ ने मिलकर पुरा किया था-

स्कन्दस्वामी नारायण उदगीथ इति क्रमात्।
चक्रु: सहैकमृग्भाष्यं पदवाक्यार्थगोचरम् ।।

ऋग्वेद के प्रसिद्ध भाष्यकारों मे माधवभट्ट के अलावा चार भाष्यकार ज्ञात हुए है । इनमे से एक तो सामवेद संहिता के भाष्यकार के रूप मे प्रसिद्ध है, शेष तीन ऋग्वेद भाष्यकार के रूप मे परन्तु इन तीनो को ठीक ठीक पहचान नही हो पाती । एक माधव तो आचार्य सायण ही है, आचार्य सायण ने अपने बडे भाई माधव की प्रेरणा एवं सहयोग से तैयार किये ऋग्भाष्य को माधवीय भाष्य की संज्ञा प्रदान की है।

कतिपय विद्वान वेंकट माधव को ही माधव भट्ट मानते है। परन्तु अनेक प्रमाणों उदाहरणो से यह सिद्ध हो गया है कि माधव भट्ट नामक विद्वान महान वेदविद वेंकट माधव से बहुत पहले हुए है । जिनकी छाप वेंकटमाधव तथा अन्य ऋग्भाष्कारों पर भी पडी है। माधव भट्ट कृत ऋग्भाष्य जिसका बहुत थोडा सा अंश उपलब्ध होता है उससे ज्ञात होता है। कि उनका वेदार्थ ज्ञान बहुत ही उच्चकोटि का था। जिसका अनुकरण सायणाचार्य तथा वेंकटमाधव ने ही नही किया अपितु स्कन्द स्वामी ने भी किया है। इससे सिद्ध होता है कि माधव भट्ट का समय स्कन्द स्वामी ( सप्तम शती ) से भी प्राचीन है। जिसका सुनिश्चित रूप आज भी इतिहासकारों के लिए एक पहेली बनकर रह गया है।

सीमित शब्दों मे भाष्य लिखने के लिए प्रसिद्ध वेंकटमाधव का समय कतिपय प्रमाणों के आधार पर १०५०--११५० ई० के मध्य माना जाता है । इसकी पुष्टि स्कन्द स्वामी कृत ऋग्भाष्य की भूमिका पृ०७ पर प० साम्बशिव शास्त्री ने की है। वेंकटमाधव कृत ऋग्भाष्य संक्षिप्त है। इसमे न व्याकरणात्मक टिप्पणी है और न अन्य कोई टिप्पणी; केवल पदों की व्याख्या पर्यायवाची शब्दों को देकर की गई है। एक विशेषता इसमे विशेष रूप से पायी जाती है वह ब्राह्मण ग्रन्थों से सुन्दर रीति से प्रस्तुत किये गये प्रमाण ।

विक्रम की १६ वी शती से पूर्व विद्यमान रहने वाले धानुष्कयज्या नामक वेद भाष्यकार का उल्लेख प्राय: इतिहास ग्रन्थों मे पाया जाता है । इनके द्वारा तीन वेदों के भाष्य किये जाने का संकेत त्रिवेदी भाष्यकार तथा त्रयीनिष्ट वृद्ध संज्ञाओं से प्राप्त होता है।
इससे अधिक नही इनके विषय मे और नही इनके भाष्य के विषय मे ज्ञात हो सका है। इतिहास इस संदर्भ मे प्रायः मौन ही है ।

चौदहवी सदी के मध्य विद्यमान रहने वाले वैष्ण्वाचार्य आनन्दतीर्थ ने ऋग्वेद के कुछ मन्त्रों पर अपना भाष्य लिखा है। यह द्वैतवादी चिन्तन धारा से ओत प्रोत है साथ ही छन्दोबद्ध भी है । यह भाष्य ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के प्राय चालीस सूक्तों पर उपलब्ध होते है -

ऋक शाखागतैकोत्तर सहस्त्र सूक्त मध्ये -- कानिचित् चत्वारिंशत् सूक्तानि भगवत्पादै व्याख्यातानि ( राघवेन्द्र यति) इसे ही मध्वभाष्य भी कहा जाता है, यही माध्व वैष्णव सम्प्रदाय का मूल श्रोत माना जाता है ।

#बांकी_तो_आप_जानते_ही_है_।

भाग 8/n से आगे:मख़ान की खेती बहुत आसान है और मुनाफ़ा दुगुना से चौगुना (अगर मछली और बतख़ को जोड़ दिया जाए) धान गेहूं जैसे...
11/12/2020

भाग 8/n से आगे:

मख़ान की खेती बहुत आसान है और मुनाफ़ा दुगुना से चौगुना (अगर मछली और बतख़ को जोड़ दिया जाए) धान गेहूं जैसे पारम्परिक खेती के मुक़ाबले।
एक उदाहरण से समझिए..
1 एकड़ की खेती से 12-15 quintal मखान का गुर्री निकाला जा सकता है..
आज का बाज़ार भाव 18000 रुपया प्रति क्विंटल है। average क़ीमत 12000-14000 के बीच रहती है।
ऐसे बीज develop हो गया है कि अब इसको साल में 2 बार किया जा सकता है .. मतलब 2 फसल.. मतलब दुगुना आमदनी।
आप 12000 का भाव भी ले लीजिए और 15 क्विंटल का फसल तो प्रति एकड़ आमदनी 180,000 रुपया।
और साल में 2 फसल तो 360,000 रुपया की आमदनी।
मछली और बतख़ भी उसी खेत में करना icing on the cake जैसा होगा। खर्च कितना होगा खेती में? इसके लिए फॉर्म भरिये।
अभी आपके जमीन/तालाब से कितनी आमदनी हो रही है? हिसाब लगा के देख लीजिए।

सबसे बड़ी बात.. आपको बेचने कहीं नहीं जाना.. आपके खेत/तालाब से मखान के गुर्री की ख़रीदी होगी और पेमेंट बिलकुल नक़द Cash crop.. गुर्री उठने से पहले।

मैंने परसों एक पोस्ट किया था जिसमें मखान की खेती के लिए interested लोग फ़ॉर्म भर कर दे सकते है।

https://surveyheart.com/form/5fd0b2a77601894e57ab4b98

लेकिन हम गलबज्जु मैथिल (बक़ौल Kailash Kumar Mishra जी) सिर्फ़ गाल बजाने में माहिर है और झंडा का डंडा ..
मैं आह्वान करता हूँ उन मैथिलों को जो...

- रोज़गार ढूँढ रहें है .. मिथिला या मिथिला से बाहर
- जो ज़मींदार है लेकिन खेती नहीं कर रहे, ज़मीन या तो परती है या बटाई पर है..
- जो सरकार को कोस रहे है कि सरकार रोज़गार नहीं दे रही है..
- जो चीनी मिल या और कोई और बहाना बना युवाओं से अपनी राजनीति की खेती करवा रहे है..
- और उन प्रवासी मैथिल से भी जो बिहार से बाहर बैठ ‘हा मिथिला हा मैथिली’ का प्रलाप कर सोशल मीडिया पर अपना चेहरा काला कर रहे है लेकिन ground zero पर काम करना पड़े तो कोसों दूर जा बैठते है।

On serious note.. मैं आह्वान करूँगा उन सभी को जो अपनी जन्मभूमि को कर्मभूमि बनाना चाहते है.. अवसर बहुत है.. कई लोग पहचान चुके है..
Copied

We are opening opportunity for you to become Managing Farmer of your Pond/Field/Chaur/Low lying Land. If interested, please submit information as requested.

*समय का विभाजन करके यदि प्रतिदिन सभी परिवार 2 अप्रैल तक ऐसे ही घरों में रहें तो हमारी जीत होगी और करोना की हार*कल जनता क...
21/03/2020

*समय का विभाजन करके यदि प्रतिदिन सभी परिवार 2 अप्रैल तक ऐसे ही घरों में रहें तो हमारी जीत होगी और करोना की हार*
कल जनता कर्फ्यू के दिन अपने घर से कदापि ना निकले और निम्नलिखित दिनचर्या का पालन करें ऐसी अपेक्षा है👏👏
👉 जागरण- प्रातः 5:00 बजे
👉शारीरिक स्वच्छता एवं साफ सफाई प्रातः 6:00
👉योगा सूर्य नमस्कार 6:15 से 7:30 बजे तक
👉नाश्ता व घर परिवेश की साफ सफाई 7:30 बजे से 9:30 बजे तक
👉स्नान/ हवन, पूजा 9:30 बजे से 10:30 बजे तक (हवन करना आवश्यक है)
👉जलपान 10:30 बजे
👉पारिवारिक बैठक 10:30 बजे से 12:30 बजे तक (शुद्ध शाकाहारी भोजन तथा प्रकृति प्रेम के विषय पर चर्चा)
👉भोजन 12:30 बजे से 1:00 बजे तक
👉विश्राम 1:00 बजे से 3:00 बजे तक
👉जलपान 3:00 बजे से 4:00 बजे तक
👉परिवारिक बैठक 4:00 से 4:45 तक (धार्मिक ग्रंथों तथा मूल्यों के विषय पर चर्चा)

👉 *5:00 बजे अपने खिड़की बालकनी तथा छत पर खड़े होकर घंटी और शंखनाद ,थाली तथा ताली से आपदा सेवा में कार्य कर रहे बंधुओं का उत्साहवर्धन करना*
👉पारिवारिक बैठक 6:00 बजे से 7:00 बजे तक भजन एवं कीर्तन
👉भोजन की तैयारी 7:00 बजे से 8:00 बजे तक
👉भोजन 8:00 बजे से लेकर 9:00 बजे तक
👉रात्रि विश्राम एवं दीप विसर्जन विश्वकल्याण मंत्र 10:00 बजे रात्रि के

कॅरोना हारेगा भारत जीतेगा🇮🇳

Various designs by ghar angan PG jhanjharpur
08/03/2020

Various designs by ghar angan PG jhanjharpur

Use of Drum seeder and technique of water recharge Practice in your field
05/01/2020

Use of Drum seeder and technique of water recharge
Practice in your field

Solar pump A boon to farming community
04/12/2019

Solar pump A boon to farming community

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Station Road
Madhubani
847211

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