10/08/2023
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( के आगे पढिए.....)
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हम पढ़ रहे हैं मुक्तिबोध पेज नंबर (43-44-45)
सदना एक कसाई का नौकर था। प्रतिदिन 2 से 10 तक बकरे-बकरी, गाय-भैंसें
काटता था। उसी से निर्वाह चल रहा था। एक दिन परमेश्वर एक मुसलमान फकीर जिन्दा बाबा के रूप में सदन कसाई को मिले। उसको भक्ति ज्ञान समझाया। जीव हिंसा से होने
वाले पाप से परिचित कराया। सर्व ज्ञान समझकर सदन कसाई ने दीक्षा लेने की प्रबल
इच्छा व्यक्त की। परमेश्वर जिन्दा ने कहा कि पहले यह कसाई का कार्य त्याग, तब दीक्षा
दूँगा। सदना के सामने निर्वाह की समस्या थी। वह जिन्दा बाबा को बताई। जिन्दा वेशधारी
प्रभु ने कहा कि भाई सदना! कसाई तो कुल सौ हैं आपके शहर में, अन्य हजारों व्यक्ति भी
निर्वाह कर रहे हैं। आप भी कोई अन्य कार्य कर लो। सदना इस कार्य के लिए तैयार नहीं
हुआ। अपनी निर्वाह की समस्या आगे रखी। जिन्दा ने कहा कि आप हिंसा कम कर दो।
सदना ने कहा कि मैं मालिक की आज्ञा की अवहेलना नहीं कर सकता। वह जितने पशु
काटने को कहेगा, मुझे काटने पड़ेंगे। जिन्दा बाबा ने कहा कि आप निर्धारित कर लो कि
इतने पशुओं से अधिक नहीं काटूँगा चाहे नौकरी त्यागनी पड़े, तो मैं आपको दीक्षा दे दूँगा।
सदना कसाई की दीक्षा लेने की इच्छा प्रबल थी। नौकरी छूटने का भय भी कम नहीं था।
इसलिए इस बात पर सहमत हो गया और हिसाब लगाया कि प्रतिदिन छोटे-बड़े 10 या 12
पशु ही कटते हैं। यदि कोई इद-बकरीद त्यौहार आता है या किसी के विवाह में माँस की
पार्टी होती है तो मुश्किल से 50 पशु वध किए जाते हैं। सदना ने कहा कि बाबाजी! मैं पक्का वादा (वचन) करता हूँ कि सौ पशुओं से अधिक नहीं काटूँगा, चाहे नौकरी भी क्यों न त्यागनी पड़े। जिन्दा बाबा बोले, ठीक है। आपको मुझसे मिलने की इच्छा हो तो मैं जगन्नाथ मंदिर में पुरी में रहता हूँ, वहाँ आ जाना। कुछ समय सब ठीक-ठाक चलता रहा। एक दिन नगर में कई विवाह थे। साथ में नवाब के लड़के का विवाह था। उस दिन पूरे सौ बकरे काटे। सदना ने अल्लाह का धन्यवाद किया। अपना वचन खण्ड होने से बाल-बाल बचा। सब औजार धोकर साफ करके रख दिए। कुछ रात्रि बीतने के पश्चात् मालिक कसाई के पास एक अन्य कसाई आया। उसके शहर में 50 बकरों की आवश्यकता थी। उसके लिए वह सदना के मालिक के पास आया तथा 50 बकरे लेने की बात कही, सौदा तय हो गया। रात्रि में सदना के मालिक के घर ही रूका। उसके खाने के लिए मालिक ने सदना को बुलाया तथा एक बकरा काटकर एक व्यक्ति की सब्जी के लिए माँस रसोई में भेजने के लिए कहा। सदना को पसीना आ गया। अपना वचन खण्ड होने का भय सताने लगा। उसी समय एक विचार आया कि क्यों न बकरे के अण्डकोष काटकर रसोई में भेज दूँ। मेरा वचन भी रह जाएगा और मालिक भी खुश रहेगा। एक बकरा लाकर सदना ने उसके अण्डकोष काटने के लिए छुरा उठाया। उसी समय परमात्मा ने बकरे को मनुष्य बुद्धि प्रदान कर दी तथा तत्वज्ञान की रोशनी कर दी।
बकरे ने कहा कि हे सदन भाई! आप मेरी गर्दन काटो, अण्डकोष मत काटो। आप यह नया वैर शुरू ना करो। हे सदना! मैंने कसाई रूप में तेरे कई सिर काटे हैं जब तुम बकरे की योनि में थे। आपने भी मेरे बहुत सिर काटे हैं जब मैं बकरा और तुम कसाई थे। यदि आप मेरे अण्डकोष काटोगे तो मैं सारी रात्रि तड़फ-तड़फकर रो-रोकर मरूँगा। अगले किसी जन्म में जब मैं कसाई बनूँगा, तुम बकरा बनोगे तो अल्लाह के विधान अनुसार मैं तेरे अण्डकोष काटूँगा, तुम भी तड़फ-तड़फकर प्राण त्यागोगे। इसलिए यह नई दुश्मनी शुरू न कर। मेरी गर्दन काट, अपना बदला ले।
उसी समय सदने के हाथ से करद (लम्बा चाकू) छूट गया। काँपने लगा। अचेत होकर
गिर गया। मालिक ने रसोईये को आवाज लगाई कि खाना लाओ। रसोईये ने बताया कि
सदना ने माँस नहीं पहुँचाया तो मालिक कुछ नौकरों के साथ आया। सदना जमीन पर बैठा
था। वह सचेत हो चुका था। बकरा खड़ा था। वहीं पर चाकू पड़ा था। मालिक ने कहा, नमक हराम ! इतनी देर कर दी माँस भेजने में, जल्दी कर। सदना ने हाथ जोड़कर कहा, मालिक! बहुत बकरे काट दिए हैं। सौ बकरे काटे हैं, अब और नहीं कटते। मैं और नहीं काटूँगा। कल काट दूँगा। मालिक जो कसाई ठहरा। क्रोध में भरकर साथ में आए नौकरों से कहा कि इसी छुरे से इसके दोनों हाथ काट दो, चाहे सदना हाथ जोड़े, गिड़गिड़ाता रहे। ये नमक-हराम मेरे लाभ में खुश नहीं है। इस सौदागर ने दुगने मूल्य में बकरों का सौदा किया है। भोजन देरी के कारण नाराज होकर चला गया तो मेरी कितनी हानि हो जाएगी। यह आज आज्ञा का पालन नहीं कर रहा है, पक्का हराम खोर है। इतना सुनकर नौकरों ने सदना के दोनों हाथ काट दिए। नौकरी से निकाल दिया। वैद्य के पास जाकर इलाज कराया। जख्म भरने
के पश्चात् सदना भक्त जगन्नाथ पुरी की ओर चला। चलते-चलते रात्रि में एक गाँव में एक
नम्बरदार के घर रूका। नम्बरदारनी ने सदना को अपने हाथों भोजन कराया। सदना ने उस देवी की भूरी-भूरी प्रशंसा की। नम्बरदारनी की चाल-चलन (चरित्रा) अच्छा नहीं था। वह सदना के यौवन पर दृष्टि लगाए हुए थी। सदना सुंदर जवान था। आयु तीस वर्ष के
आसपास थी। रात्रि में नम्बरदारनी सदना के बिस्तर पर आ गई और अपने साथ संभोग
करने को कहा। सदना बिस्तर छोड़कर खड़ा हो गया और कहा बहन! आप नम्बरदार की
इज्जत हो, आप उसकी धरोहर हो। मैं पहले ही दुःखी हूँ। आप मुझे क्षमा करो। मैं अभी
चला जाता हूँ। आप नम्बरदार जी के साथ धोखा कर रही हो, आपको अल्लाह के दरबार
में जवाब देना पड़ेगा। डरो उस परवरदिगार से। सदना का यह उत्तर सुनकर नम्बरदारनी ने विचार किया कि यह मेरे पति को बताएगा, इससे पहले मैं ही बता देती हूँ। रात्रि के दो बजे थे। नम्बरदारनी ने कहा कि वह व्यक्ति जो आज अपना मेहमान बना था, मेरे साथ गलत हरकत करने लगा। यह कहकर बुरी तरह रोने लगी। पृथ्वी पर गिरकर सिर पटकने लगी। नम्बरदार ने तुरंत अपने आदमियों को सदना को पकड़कर लाने को कहा। सदना को पकड़कर पंचायतघर (चौपाल) में बाँधकर बैठा दिया। नवाब के पास शिकायत की गई। नवाब ने सदना को बुलाकर पूछा कि तेरे को अतिथि बनाकर रखा, भोजन दिया। अरे दुष्ट! तूने यह क्या किया? सदना ने अपनी हकीकत बताई, परंतु नवाब तथा पंचायत को झूठी कहानी लगी। नवाब ने सदना भक्त को मीनार में चिनवाने का आदेश दिया। एक छोटा-सा मंदिरनुमा भवन बनाया गया, उसके अंदर भक्त को बाँधकर डाला गया। उद्देश्य था कि सदना दम घुटकर रो-रोकर, तड़फ-तड़फकर मरे। नम्बरदारनी ने आरोप लगाया था कि इसने मेरी छाती पर हाथ डाला।
दोनों स्तनों को टुंडे हाथों से छूआ। मेरी नींद खुली तो मैंने विरोध किया तथा पति को बताने
की बात कही तो उठकर चला गया। रास्ते से पकड़कर लाए हैं जी! ज्योंही कारीगर मीनार का द्वार बंद करके हटे, उसी समय मीनार के पत्थर-ईटें आकाश में उड़ गई जैसे बम्ब
विस्फोट हुआ हो। कुछ वहीं आसपास गिर गई, कुछ नवाब के आँगन में गिरी। कुछ
नम्बरदार के घर की छत पर तथा आँगन में गिरी। नम्बरदारनी के दोनों स्तन कटकर गिर
गए। वो दर्द के मारे चिल्लाने लगी। अपनी गलती को बताने लगी। पूरे शहर के
व्यक्ति-नवाब तथा उसका परिवार मीनार के पास आया। भक्त सदना आराम से बैठा था।
उसके दोनों हाथ स्वस्थ हो गए। कटे हुए थे, पूर्ण हो गए। सब नगर निवासियों ने तथा
नम्बरदार-नम्बरदारनी ने अपनी-अपनी गलती की क्षमा याचना की। भक्त सदना वहाँ से
चलकर जगन्नाथ पुरी में पहुँचा। वहाँ वही सतगुरू मिले। उनको सदना ने बकरे से प्राप्त
उपदेश बताया। दीक्षा ली और कल्याण कराया।
{नोट :- कुछ वक्ता कहते हैं कि सदना के हाथ कसाई ने नहीं कटवाए थे, नवाब ने
कटवाए थे क्योंकि नम्बरदारनी ने कहा था कि हाथों से मेरे स्तनों को छूआ था। परंतु विचार करें तो ऐसे निष्कर्ष निकलता है :- मुसलमान राजा या नवाब हाथ काटने की सजा चोरी करने वाले को देते थे। यह चोरी का मामला नहीं था। दूसरा विचार यह आता है कि यदि नम्बरदारनी के स्तन हाथों से छूने के कारण हाथ नवाब ने कटवाए थे तो मौत की सजा नहीं सुनाई जाती। हाथ कटवा देना पर्याप्त दण्ड था। फिर भी हमने कथा के सारांश को समझना है।}
सदना भक्त से क्षमा याचना तथा अपनी गलती सार्वजनिक करने से नम्बरदारनी के
स्तनों के जख्म ठीक हो गए। दर्द भी बंद हो गया, परंतु कटे निशान आजीवन बने रहे।
कुछ वर्षों के पश्चात् सदना की प्रेरणा से उस नगर के 80 प्रतिशत हिन्दु-मुसलमानों ने
परमेश्वर जिन्दा बाबा से दीक्षा ली और अपने जीव का कल्याण कराया।
वाणी नं. 39 का अनुवाद चल रहा है।
परमेश्वर कबीर जी ने अपनी प्यारी आत्मा संत गरीबदास जी को तत्वज्ञान दिया
जिसको संत गरीबदास जी ने आध्यात्म ज्ञान रूपी सागर को अमृत वाणी रूपी गागर (घड़े)
में भरकर रखा है जिसका सरलार्थ कार्य मुझ दास (संत रामपाल दास) द्वारा गागर से सागर का रूप दिया जा रहा है।
वाणी नं. 39 की एक पंक्ति का सरलार्थ हुआ है।
गरीब, राम नाम सदने पीया, बकरे के उपदेश। अजामेल से उधरे, भक्ति बंदगी पेश।।
क्रमशः..........
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