01/05/2026
काशी के मणिकर्णिका घाट पर लोग उसे नंगा बाबा कहते थे। उसका असली नाम किसी को याद नहीं था। चेलों ने नाम रखा था, स्वामी विदेहानंद। विदेह, यानी देह से परे।
वह अस्सी साल से उसी घाट की एक टूटी सीढ़ी पर बैठता था। न कुटिया, न कमंडल। सिर्फ एक काली चादर, जो सर्दी में ओढ़ लेता, गर्मी में नीचे बिछा लेता। लोग जलते हुए मुर्दे लेकर आते, वह देखता रहता। कोई पूछता, बाबा डर नहीं लगता। वह हँसता, "जिस घाट पर रोज़ सौ लोग मरते हैं, वहाँ डरने वाला तो मैं ही अकेला बचूँगा।"
विदेहानंद मौत से नहीं डरता था, वह मौत को देखता था। हर चिता के साथ वह एक मंत्र जपता था, "मृत्योर्मा अमृतं गमय"। मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो।
उसकी उम्र जब एक सौ आठ हुई, तो एक रात यमराज के दूत आए।
कहानी यहीं से शुरू होती है।
पहली रात
भादों की अमावस थी। घाट पर कोई चिता नहीं जल रही थी। विदेहानंद आँखें बंद किए बैठा था। तभी दो छायाएँ आईं, काली, लंबी, भैंसे की सींगों जैसी परछाई। उन्होंने पाश फेंका।
विदेहानंद ने आँखें खोलीं। "रुको।"
दूत चौंके। आज तक कोई रुको नहीं कहता था।
"मालिक को बुलाओ। मुझे दूतों से बात नहीं करनी।"
दूत हँसे। "तू साधु है, राजा नहीं।"
विदेहानंद ने चादर लपेटी और पद्मासन में बैठ गया। उसने प्राण को खींच कर ब्रह्मरंध्र में रोक लिया। शरीर वहीं रह गया, साँस बंद। दूतों का पाश खाली लौट गया।
उसी क्षण विदेहानंद वैतरणी के किनारे खड़ा था।
सामने वही नदी थी जिसके बारे में पुराणों में लिखा है, पीप और रक्त से भरी। किनारे पर काला भैंसा खड़ा था, और उस पर बैठा था यमराज। नीला शरीर, लाल आँखें, हाथ में दंड। पास में चित्रगुप्त बही खोले बैठे थे।
यमराज ने देखा और भौंह चढ़ाई। "तू यहाँ कैसे आया। तेरा समय कल था।"
विदेहानंद ने हाथ जोड़े नहीं। उसने कहा, "मैं अपना समय लेने आया हूँ, देने नहीं।"
यमराज हँसा। "एक सौ आठ साल में पहली बार कोई साधु मुझसे संवाद करने आया है। बोल।"
संवाद
विदेहानंद बोला, "तीन प्रश्न हैं। उत्तर दे दो, मैं चलूँगा।"
यमराज ने दंड ठोका। "पूछ।"
"पहला, तुम मारते हो या बुलाते हो।"
यमराज ने चित्रगुप्त की ओर देखा। चित्रगुप्त ने बही पलटी। "देखो स्वामी, मैं नहीं मारता। मैं हिसाब करता हूँ। मारता है आदमी का अपना किया। जब घड़ा भर जाता है, मैं सिर्फ घड़ा उठा लेता हूँ। लोग मुझे दोष देते हैं, पर मैं तो डाकिया हूँ।"
विदेहानंद मुस्कुराया। "तो फिर लोग तुमसे डरते क्यों हैं।"
"क्योंकि वे घड़ा भरते समय मुझे याद नहीं करते, घड़ा उठते समय गाली देते हैं।"
"दूसरा प्रश्न। तुम हराते हो या हरते हो।"
यमराज कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "मैं हरता हूँ। हरता हूँ, मतलब ले जाता हूँ। पर हराता नहीं। हराता है आदमी खुद को, जब वह जीते जी मर जाता है। डर में, लोभ में, नफरत में। जो जीते जी मर गया, उसे मैं दोबारा नहीं मारता, मैं सिर्फ दरवाज़ा खोलता हूँ।"
विदेहानंद ने तीसरा प्रश्न पूछा। "अगर मैं तुमसे अपना जीवन माँगू, तो क्या दोगे।"
यमराज हँसा। "साधु, तू तो मृत्यु को हराने आया था। अब जीवन माँग रहा है।"
विदेहानंद ने कहा, "मैं अपना जीवन नहीं माँग रहा। मैं उन सबका जीवन माँग रहा हूँ जो आज मणिकर्णिका पर जल रहे हैं। मेरे घाट पर आज एक माँ अपने बेटे को लेकर रो रही थी, एक किसान कर्ज़ में, एक लड़की दहेज में। उन्हें ले जाओ, मुझे ले जाओ, पर एक साथ नहीं। बारी बारी।"
चित्रगुप्त ने बही देखी। "इसके पुण्य बहुत हैं। अस्सी साल घाट पर बैठ कर इसने हर मुर्दे का नाम लिया है। इसका घड़ा खाली है।"
यमराज ने दंड नीचे रखा। "विदेहानंद, तूने मृत्यु को नहीं हराया, तूने मृत्यु को समझ लिया। जो समझ लेता है, वह मरता नहीं। वह लौटता है।"
विदेहानंद बोला, "तो मुझे लौटा दो।"
"क्यों। तू तो मुक्त हो सकता है।"
"क्योंकि अभी घाट पर कोई नहीं है जो मरने वाले को बताए कि डरने की ज़रूरत नहीं। तुम डाकिया हो, मैं पता बताने वाला।"
यमराज ने भैंसे से उतर कर विदेहानंद के कंधे पर हाथ रखा। वह हाथ बर्फ जैसा ठंडा था। "जा। पर एक शर्त है। तूने मेरा दंड देखा है, अब तू हर जीव में मुझे देखेगा। कुत्ते में, कोढ़ी में, राजा में। अगर एक में भी नफरत की, तो मैं उसी क्षण आ जाऊँगा।"
विदेहानंद ने कहा, "मंजूर।"
वापसी
उसी रात मणिकर्णिका पर हलचल मची। नंगा बाबा का शरीर चार घंटे से ठंडा पड़ा था। चेलों ने चिता सजानी शुरू कर दी थी। तभी बाबा ने आँखें खोलीं।
लोग चीखे, भूत, भूत। विदेहानंद उठा, चादर झाड़ी, और बोला, "भूत नहीं, डाकिया मिल कर आया हूँ।"
लोगों ने पूछा, यमराज कैसा दिखता है।
उसने कहा, "बिल्कुल तुम्हारे जैसा। बस उसके हाथ में बही है, तुम्हारे हाथ में मोबाइल। वह हिसाब लिखता है, तुम हिसाब भूलते हो।"
उस दिन के बाद विदेहानंद बदला नहीं, पर उसकी बातें बदल गईं। वह मरने वालों के परिवार से कहता, "रो मत। वह गया नहीं, वह जमा हो गया।" वह जलती चिता को देख कर कहता, "देखो, यमराज आ गया, दंड नहीं, दरवाज़ा लेकर।"
लोग पूछते, बाबा तुम मरे थे।
वह कहता, "हाँ। और तभी जिया। क्योंकि मृत्यु को हराना साँस रोकना नहीं है। मृत्यु को हराना यह जान लेना है कि जो ले जाता है, वह दुश्मन नहीं, द्वारपाल है।"
विदेहानंद एक सौ तेईस साल तक जिया। जब सच में यमराज आए, तो दूत नहीं आए। यमराज खुद भैंसे पर आए। विदेहानंद ने आँखें खोलीं, मुस्कुराया।
"चलें।"
यमराज ने पूछा, "डर नहीं।"
विदेहानंद ने चादर समेटी। "जिससे एक बार संवाद हो जाए, उससे डर कैसा।"
कहते हैं उस रात मणिकर्णिका पर चिता नहीं जली। सिर्फ एक दीया जलता रहा। और घाट पर बैठे लोगों ने हवा में दो आवाज़ें सुनीं, एक दंड की, एक हँसी की। जैसे दो पुराने मित्र बात करते हुए जा रहे हों।