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काशी के मणिकर्णिका घाट पर लोग उसे नंगा बाबा कहते थे। उसका असली नाम किसी को याद नहीं था। चेलों ने नाम रखा था, स्वामी विदे...
01/05/2026

काशी के मणिकर्णिका घाट पर लोग उसे नंगा बाबा कहते थे। उसका असली नाम किसी को याद नहीं था। चेलों ने नाम रखा था, स्वामी विदेहानंद। विदेह, यानी देह से परे।

वह अस्सी साल से उसी घाट की एक टूटी सीढ़ी पर बैठता था। न कुटिया, न कमंडल। सिर्फ एक काली चादर, जो सर्दी में ओढ़ लेता, गर्मी में नीचे बिछा लेता। लोग जलते हुए मुर्दे लेकर आते, वह देखता रहता। कोई पूछता, बाबा डर नहीं लगता। वह हँसता, "जिस घाट पर रोज़ सौ लोग मरते हैं, वहाँ डरने वाला तो मैं ही अकेला बचूँगा।"

विदेहानंद मौत से नहीं डरता था, वह मौत को देखता था। हर चिता के साथ वह एक मंत्र जपता था, "मृत्योर्मा अमृतं गमय"। मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो।

उसकी उम्र जब एक सौ आठ हुई, तो एक रात यमराज के दूत आए।

कहानी यहीं से शुरू होती है।

पहली रात

भादों की अमावस थी। घाट पर कोई चिता नहीं जल रही थी। विदेहानंद आँखें बंद किए बैठा था। तभी दो छायाएँ आईं, काली, लंबी, भैंसे की सींगों जैसी परछाई। उन्होंने पाश फेंका।

विदेहानंद ने आँखें खोलीं। "रुको।"

दूत चौंके। आज तक कोई रुको नहीं कहता था।

"मालिक को बुलाओ। मुझे दूतों से बात नहीं करनी।"

दूत हँसे। "तू साधु है, राजा नहीं।"

विदेहानंद ने चादर लपेटी और पद्मासन में बैठ गया। उसने प्राण को खींच कर ब्रह्मरंध्र में रोक लिया। शरीर वहीं रह गया, साँस बंद। दूतों का पाश खाली लौट गया।

उसी क्षण विदेहानंद वैतरणी के किनारे खड़ा था।

सामने वही नदी थी जिसके बारे में पुराणों में लिखा है, पीप और रक्त से भरी। किनारे पर काला भैंसा खड़ा था, और उस पर बैठा था यमराज। नीला शरीर, लाल आँखें, हाथ में दंड। पास में चित्रगुप्त बही खोले बैठे थे।

यमराज ने देखा और भौंह चढ़ाई। "तू यहाँ कैसे आया। तेरा समय कल था।"

विदेहानंद ने हाथ जोड़े नहीं। उसने कहा, "मैं अपना समय लेने आया हूँ, देने नहीं।"

यमराज हँसा। "एक सौ आठ साल में पहली बार कोई साधु मुझसे संवाद करने आया है। बोल।"

संवाद

विदेहानंद बोला, "तीन प्रश्न हैं। उत्तर दे दो, मैं चलूँगा।"

यमराज ने दंड ठोका। "पूछ।"

"पहला, तुम मारते हो या बुलाते हो।"

यमराज ने चित्रगुप्त की ओर देखा। चित्रगुप्त ने बही पलटी। "देखो स्वामी, मैं नहीं मारता। मैं हिसाब करता हूँ। मारता है आदमी का अपना किया। जब घड़ा भर जाता है, मैं सिर्फ घड़ा उठा लेता हूँ। लोग मुझे दोष देते हैं, पर मैं तो डाकिया हूँ।"

विदेहानंद मुस्कुराया। "तो फिर लोग तुमसे डरते क्यों हैं।"

"क्योंकि वे घड़ा भरते समय मुझे याद नहीं करते, घड़ा उठते समय गाली देते हैं।"

"दूसरा प्रश्न। तुम हराते हो या हरते हो।"

यमराज कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "मैं हरता हूँ। हरता हूँ, मतलब ले जाता हूँ। पर हराता नहीं। हराता है आदमी खुद को, जब वह जीते जी मर जाता है। डर में, लोभ में, नफरत में। जो जीते जी मर गया, उसे मैं दोबारा नहीं मारता, मैं सिर्फ दरवाज़ा खोलता हूँ।"

विदेहानंद ने तीसरा प्रश्न पूछा। "अगर मैं तुमसे अपना जीवन माँगू, तो क्या दोगे।"

यमराज हँसा। "साधु, तू तो मृत्यु को हराने आया था। अब जीवन माँग रहा है।"

विदेहानंद ने कहा, "मैं अपना जीवन नहीं माँग रहा। मैं उन सबका जीवन माँग रहा हूँ जो आज मणिकर्णिका पर जल रहे हैं। मेरे घाट पर आज एक माँ अपने बेटे को लेकर रो रही थी, एक किसान कर्ज़ में, एक लड़की दहेज में। उन्हें ले जाओ, मुझे ले जाओ, पर एक साथ नहीं। बारी बारी।"

चित्रगुप्त ने बही देखी। "इसके पुण्य बहुत हैं। अस्सी साल घाट पर बैठ कर इसने हर मुर्दे का नाम लिया है। इसका घड़ा खाली है।"

यमराज ने दंड नीचे रखा। "विदेहानंद, तूने मृत्यु को नहीं हराया, तूने मृत्यु को समझ लिया। जो समझ लेता है, वह मरता नहीं। वह लौटता है।"

विदेहानंद बोला, "तो मुझे लौटा दो।"

"क्यों। तू तो मुक्त हो सकता है।"

"क्योंकि अभी घाट पर कोई नहीं है जो मरने वाले को बताए कि डरने की ज़रूरत नहीं। तुम डाकिया हो, मैं पता बताने वाला।"

यमराज ने भैंसे से उतर कर विदेहानंद के कंधे पर हाथ रखा। वह हाथ बर्फ जैसा ठंडा था। "जा। पर एक शर्त है। तूने मेरा दंड देखा है, अब तू हर जीव में मुझे देखेगा। कुत्ते में, कोढ़ी में, राजा में। अगर एक में भी नफरत की, तो मैं उसी क्षण आ जाऊँगा।"

विदेहानंद ने कहा, "मंजूर।"

वापसी

उसी रात मणिकर्णिका पर हलचल मची। नंगा बाबा का शरीर चार घंटे से ठंडा पड़ा था। चेलों ने चिता सजानी शुरू कर दी थी। तभी बाबा ने आँखें खोलीं।

लोग चीखे, भूत, भूत। विदेहानंद उठा, चादर झाड़ी, और बोला, "भूत नहीं, डाकिया मिल कर आया हूँ।"

लोगों ने पूछा, यमराज कैसा दिखता है।

उसने कहा, "बिल्कुल तुम्हारे जैसा। बस उसके हाथ में बही है, तुम्हारे हाथ में मोबाइल। वह हिसाब लिखता है, तुम हिसाब भूलते हो।"

उस दिन के बाद विदेहानंद बदला नहीं, पर उसकी बातें बदल गईं। वह मरने वालों के परिवार से कहता, "रो मत। वह गया नहीं, वह जमा हो गया।" वह जलती चिता को देख कर कहता, "देखो, यमराज आ गया, दंड नहीं, दरवाज़ा लेकर।"

लोग पूछते, बाबा तुम मरे थे।

वह कहता, "हाँ। और तभी जिया। क्योंकि मृत्यु को हराना साँस रोकना नहीं है। मृत्यु को हराना यह जान लेना है कि जो ले जाता है, वह दुश्मन नहीं, द्वारपाल है।"

विदेहानंद एक सौ तेईस साल तक जिया। जब सच में यमराज आए, तो दूत नहीं आए। यमराज खुद भैंसे पर आए। विदेहानंद ने आँखें खोलीं, मुस्कुराया।

"चलें।"

यमराज ने पूछा, "डर नहीं।"

विदेहानंद ने चादर समेटी। "जिससे एक बार संवाद हो जाए, उससे डर कैसा।"

कहते हैं उस रात मणिकर्णिका पर चिता नहीं जली। सिर्फ एक दीया जलता रहा। और घाट पर बैठे लोगों ने हवा में दो आवाज़ें सुनीं, एक दंड की, एक हँसी की। जैसे दो पुराने मित्र बात करते हुए जा रहे हों।

बंगाल में एक अत्यंत अनूठे संन्यासी हुए—युक्तेश्वर गिरि। वे योगानंद के गुरु थे, और योगानंद ने आगे चलकर पश्चिम में अपार ख्...
17/04/2026

बंगाल में एक अत्यंत अनूठे संन्यासी हुए—युक्तेश्वर गिरि। वे योगानंद के गुरु थे, और योगानंद ने आगे चलकर पश्चिम में अपार ख्याति प्राप्त की। गिरि एक अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे।
एक दिन ऐसा हुआ कि गिरि का एक शिष्य गांव में गया। किसी शरारती व्यक्ति ने उसे परेशान किया—पत्थर मारा, मार-पीट भी की। वह यह सोचकर कि मैं संन्यासी हूं, क्या उत्तर देना, चुपचाप वापस लौट आया। उसने सोचा कि जो होने वाला है, वह हो ही गया, मैं क्यों बीच में आऊं। उसने अपने को संभाल लिया। उसके सिर पर चोट लग गई थी, थोड़ा खून भी निकल आया था, और खरोंचें भी आई थीं। लेकिन उसने मान लिया कि जो होना था, हो गया—अब उसे याद रखने का क्या लाभ! इस प्रकार अतीत भी निश्चिंत हो गया, और भविष्य भी।
जब वह भिक्षा मांगकर आश्रम लौटा, तब तक वह रास्ते की घटना को पूरी तरह भूल चुका था। गिरि ने उसके चेहरे पर चोट देखी और पूछा, “यह चोट कैसे लगी?” शिष्य को एकदम याद ही नहीं आया। फिर थोड़ी देर में उसे स्मरण हुआ। उसने कहा, “आपने याद दिलाया, रास्ते में एक आदमी ने मुझे मारा था।”
गिरि ने पूछा, “लेकिन तू इतनी जल्दी भूल गया?”
शिष्य ने उत्तर दिया, “मैंने सोचा, जो होना था, हो गया। अब उसे याद रखने से क्या होगा!”
लेकिन इस घटना में एक और गहरी बात छिपी थी।
गिरि ने पूछा, “जब वह तुझे मार रहा था, तब तूने अपने को रोका तो नहीं था? तूने क्या किया?”
शिष्य ने कहा, “एक क्षण के लिए विचार आया था कि मैं भी एक वार कर दूं। फिर मैंने अपने को रोक लिया कि जो हो रहा है, होने दूं।”
गिरि ने कहा, “तूने ठीक नहीं किया। तूने रोका। जो हो रहा था, उसे पूरा होने नहीं दिया। तूने बाधा डाली—उस व्यक्ति के कर्म में तूने हस्तक्षेप किया।”
शिष्य ने आश्चर्य से कहा, “मैंने बाधा डाली? मैंने तो उसे मारा भी नहीं! क्या आप कह रहे हैं कि मुझे उसे मारना चाहिए था?”
गिरि बोले, “मैं यह नहीं कहता कि तू मारता। मैं यह कहता हूं कि जो होना था, उसे पूर्ण होने देना था। तू निमित्त था। अब तू वापस जा—क्योंकि जो होना है, वह किसी और के माध्यम से होगा।”
अद्भुत बात यह हुई कि वह संन्यासी वापस गया। उसने देखा कि वही व्यक्ति बाजार में किसी और से पिट रहा था। वह लौटकर गिरि के चरणों में गिर पड़ा और बोला, “यह क्या हो रहा है?”
गिरि ने कहा, “जो तू नहीं कर पाया, वह कोई और कर रहा है। क्या तू सोचता है कि तेरे बिना यह नाटक रुक जाएगा? तू केवल निमित्त था।”
यह बात बड़ी गहरी है—और सामान्य नैतिक नियमों से बहुत आगे की है।
भगवान कृष्ण अर्जुन को भी यही समझा रहे हैं। वे कह रहे हैं—जो होता है, उसे होने दे। तू यह मत सोच कि ऐसा करूं या वैसा करूं; संन्यास लूं या युद्ध करूं। कृष्ण अर्जुन को संन्यास से नहीं रोक रहे। क्योंकि यदि संन्यास होना ही होगा, तो कोई उसे रोक नहीं सकता।
इस बात को भली-भांति समझ लेना चाहिए—
यदि अर्जुन के लिए संन्यास ही घटित होना है, तो वह अवश्य होगा। कृष्ण केवल इतना कह रहे हैं कि तू प्रयास करके कुछ मत कर। तू निश्चेष्ट भाव से, निमित्त मात्र बन जा, और जो घटित हो रहा है, उसे होने दे। यदि युद्ध होता है, तो ठीक। और यदि तू संन्यास लेकर चला जाता है, तो वह भी ठीक। तू बीच में मत आ, तू कर्ता मत बन—केवल निमित्त बन जा।
— ओशो ❤️❤️
(गीता दर्शन)

जब भगवान शिव स्वयं पीतांबर धारण करके कुबेर को धन प्रदान करते हैं, तो यह केवल सोने-चांदी की वर्षा नहीं होती… यह उस दिव्य ...
06/04/2026

जब भगवान शिव स्वयं पीतांबर धारण करके कुबेर को धन प्रदान करते हैं, तो यह केवल सोने-चांदी की वर्षा नहीं होती… यह उस दिव्य सत्य का संकेत होता है कि असली धन हमेशा वैराग्य और संतुलन के अधीन होता है।

शिव, जो स्वयं भस्म धारण करते हैं, जिनके पास कुछ भी नहीं… वही जब धन के स्वामी को धन देते हैं, तो यह बताता है कि संपत्ति का असली स्रोत बाहरी खजाना नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना है। कुबेर का अपार धन इस बात का प्रतीक है कि जब साधक शिव के मार्ग पर चलता है, तो उसे केवल आध्यात्मिक ही नहीं, भौतिक समृद्धि भी सहज रूप से प्राप्त होती है।

लेकिन यहाँ एक गहरा रहस्य छिपा है… कुबेर धन के स्वामी जरूर हैं, परंतु वे भी शिव के सामने नतमस्तक हैं। इसका अर्थ है कि धन का अहंकार भी शिव के सामने टिक नहीं सकता। जिस व्यक्ति के जीवन में संतुलन, संयम और सच्ची भक्ति होती है, उसके लिए धन साधन बनता है, बाधा नहीं।

यह दृश्य हमें सिखाता है कि धन तभी टिकता है, जब उसके पीछे शिव का आशीर्वाद और सही उपयोग की भावना हो। वरना वही धन विनाश का कारण भी बन सकता है। इसलिए पहले शिव को अपनाओ, फिर कुबेर अपने आप जीवन में प्रकट हो जाएंगे।

"एक बहुत पुरानी तिब्बती कथा है कि एक बार दो उल्लू एक वृक्ष पर आ कर बैठे। एक ने साँप अपने मुँह में पकड़  रखा था। वही उसका ...
31/03/2026

"एक बहुत पुरानी तिब्बती कथा है कि एक बार दो उल्लू एक वृक्ष पर आ कर बैठे। एक ने साँप अपने मुँह में पकड़ रखा था। वही उसका भोजन था, एक तरह से सुबह के नाश्ते की तैयारी थी। दूसरा एक चूहा पकड़ लाया था।

दोनों जैसे ही वृक्ष पर लगभग पास-पास आ कर बैठे। एक के मुँह में साँप, दूसरे के मुँह में चूहा! साँप ने चूहे को देखा तो वह यह भूल ही गया कि वह उल्लू के मुँह में है और मौत के करीब है।

चूहे को देख कर उसके मुँह में रसधार बहने लगी। वह भूल ही गया कि मौत के मुँह में है। उसको अपनी जीवेषणा ने पकड़ लिया। और चूहे ने जैसे ही देखा साँप को, वह भयभीत हो गया, वह कँपने लगा। ऐसे मौत के मुँह में बैठा है, मगर साँप को देख कर कँपने लगा।

वे दोनों उल्लू बड़े हैरान हुए। एक उल्लू ने दूसरे उल्लू से पूछा कि भाई, इसका कुछ राज समझे? दूसरे ने कहा, बिलकुल समझ में आया। जीभ की, रस की, स्वाद की, भोग की इच्छा इतनी प्रबल है कि सामने मृत्यु खड़ी हो तो भी दिखाई नहीं पड़ती। और यह बात भी समझ में आ गई कि 'भय' मौत से भी बड़ा डर है।

मौत सामने खड़ी है, मौत के मुँह में है, उससे भयभीत नहीं है चूहा; लेकिन डर से भयभीत है कि कहीं साँप हमला न कर दे।

बात पकड़ में आ गई होगी। मौत से हम भयभीत नहीं हैं, हम भय से, डर से ज्यादा भयभीत हैं। और लोभ स्वाद का, इंद्रियों का, जीवेषणा का इतना प्रगाढ़ है कि मौत चौबीस घंटे खड़ी है, तो भी दिखाई नहीं पड़ती।"

ओशो

आज 10 मार्च को शीतला सप्तमी का पावन पर्व है। आप सभी को शीतला सप्तमी की हार्दिक शुभकामनाएं।शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी ह...
10/03/2026

आज 10 मार्च को शीतला सप्तमी का पावन पर्व है। आप सभी को शीतला सप्तमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है जो माता शीतला को समर्पित है। यह पर्व चैत्र कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। माता शीतला को रोगों की देवी माना जाता है और उनकी कृपा से चेचक, त्वचा रोग, बुखार तथा अन्य संक्रामक रोगों से रक्षा होती है। मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक माता शीतला की पूजा करता है उसके परिवार में स्वास्थ्य, शांति और सुख-समृद्धि बनी रहती है।
शास्त्रों में माता शीतला का यह प्रसिद्ध मंत्र वर्णित है —

वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनी-कलशोपेतां शूर्पालंकृत मस्तकाम्॥

अर्थ — मैं उस माता शीतला को प्रणाम करता हूँ जो गधे पर विराजमान हैं, हाथ में झाड़ू और कलश धारण करती हैं तथा अपने भक्तों के रोग और कष्टों का नाश करती हैं।

शीतला सप्तमी और अष्टमी के दिन विशेष नियमों का पालन किया जाता है। इस पर्व के एक दिन पहले घर में भोजन बनाया जाता है जिसे बसौड़ा कहा जाता है। सप्तमी या अष्टमी के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता और उसी बासी भोजन का भोग माता शीतला को लगाया जाता है। प्रातः स्नान करके माता शीतला की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। उन्हें दही, गुड़, पूरी, हलवा, चने और ठंडे पकवान अर्पित किए जाते हैं। पूजा में नीम के पत्तों का भी विशेष महत्व होता है क्योंकि नीम को रोगनाशक और पवित्र माना जाता है।
इस दिन ठंडा भोजन अर्पित करने के पीछे यह भाव माना जाता है कि माता शीतला की कृपा से शरीर और वातावरण में शीतलता बनी रहे और रोगों का प्रकोप शांत हो जाए। यह पर्व हमें स्वच्छता, संयम और स्वास्थ्य के महत्व का भी संदेश देता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धा और नियम से शीतला सप्तमी या अष्टमी का व्रत और पूजन करता है उसके घर से रोग, कष्ट और नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है। माता शीतला की कृपा से परिवार में स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि का वास होता है।

नमामीशमीशान
#माँशीतला #शीतलामाता #सनातनधर्म #देवीउपासना #देवीमहिमा #तंत्रसाधना #हिंदूधर्म

शीतला माता को बासी पकवान का भोग लगाया जाता है। हर साल चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी आती है। इस ...
09/03/2026

शीतला माता को बासी पकवान का भोग लगाया जाता है। हर साल चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी आती है। इस दिन माता शीतला की पूजा और कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए।
शीतला माता की कथा।
एक गांव में एक ब्राह्मण दंपति रहता था। उनके दो बेटे और दो बहुएं थी। उन दोनों बहुओं को बहुत ही लंबे समय बाद बेटे हुए। इतने में शीतला अष्टमी का पर्व आया। शीतला अष्टमी के नियमानुसार, इस दिन ठंडा भोजन तैयार किया जाताहै। लेकिन, उन दोनों बहुओं के मन में विचार आया की यदि हमनें ठंड़ा भोजन खाया तो हम कहीं बीमार न पड़ जाएं। अभी बच्चे भी छोटे हैं कहीं वह भी बीमार न हो जाएं।

ऐसा में उन दोनों ने चुपचाप अपने खाना खाने के लिए दो बाटियां पशुओं के दाना देने वाले बर्तन में बनाकर तैयार कर ली। इसके बाद दोनों बहुएं अपनी सास के साथ माता शीतला की पूजा करके घर आई और माता की कथा सुनी। पूजा से लौटकर आने के बाद सास तो शीतला माता के भजन गाने लगी लेकिन, दोनों बहुएं बच्चों के रोने का बहाना बनाकर वहां से घर लौट आइए। इसके बाद दोनों से पशुओं के बर्तन से गरम-गरम बाटी निकाली और उनके सेवन किया। इसके बाद जब सास जब घर वापस आई तो उसने दोनों बहुओं को आवाज लगाई और उनसे भोजन करने के लिए कहा। दोनों से ठंडे भोजन का सेवन किया और फिर अपने काम में लग गई। इसके बाद सास ने काफी देर बाद कहा कि बच्चे बहुत देर से सोएं हैं उन्हें उठाकर भोजन कराके सुला दो।

बहुएं जैसे ही अपने बच्चों को उठाने के लिए गई उन्होंने देखा की बच्चे मृत हैं। ऐसा शीतला माता के प्रकोप के कारण हुआ। बहुएं विवश हो गई। सास को सब सारी बात पता चली तो वह बहुओं से लड़ने लगी। सास बोली कि तुम दोनों ने अपने बेटों की बदौलत शीतला माता की अवहेलना की है इसलिए मेरे घर से निकल जाओ और कैसे भी बेटों को स्वस्थ लेकर ही घर में वापस आना।

अपने मृत बेटों को लेकर दोनों बहुएं घर से निकल गई और रास्ते में जाते हुए एक जीर्ण वृक्ष के पास पहुंच गई। यह खेजड़ी के वृक्ष के नीचे पहुंची। इसके नीचे दोनों ओरी शीतला दो बहने बैठी थी। दोनों के बालों में जूं थी। वहीं, दोनों बहुएं ठक गई थी। दोनों बहुएं ओरी और शीतला के पास पहुंची। उन दोनों ने ओरी और शीतला के सिर से बहुत सारी जुएं निकाली। जूओं का नाश होने से औरी और शीतला ने अपने मस्तक में बड़ी शीतलता का अनुभव किया और उनसे कहा कि तुम दोनों ने हमारे मस्तक को शीतल ठंडा किया है। वैसे ही तुम्हें पेट की शांति मिले।

इतने पर दोनों बहुए बोली की हम किस्मत का दिया हुआ ही लेकर मारी-मारी भटक रहीं है लेकिन, शीतला माता के दर्शन नहीं हुए हैं। शीतला माता ने कहा कि तुन दोनो से पाप किया है, तुम दुष्ट हो, दुराचारिणी हो, तुम्हारा तो मुंह तक देखने योग्य नहीं है। शीतला सप्तमी के दिन ठंडा भोजन करने के बदले तुम दोनों ने गरम भोजन कर लिया था।

इतना सुनते ही बहुओं ने शीतला माताजी को पहचान लिया और दोनों ने शीतला माता को प्रणाम किया और गिड़गिड़ाते हुए बोली की हमने अनजाने में गरम खाना खा लिया। आपके प्रभाव को हम नहीं जानती थी। आप हमें क्षमा करो। हम फिर कभी ऐसा नहीं करेंगे।

उनके ऐसे वचन सुनकर शीतला माता प्रसन्न हुई और शीतला माता ने मृतक बालकों को जीवित कर दिया। इसके बाद बहुएं अपने बच्चों को लेकर फिर से गांव लोट आई। जब गांव के लोगों को पता चला की शीतला माता ने उनको दर्शन दिए हैं तो लोगों ने बहुत धूमधाम से उनके स्वागत किया और उन्होंने कहा कि हम गांव में शीतला माता के मंदिर का निर्माण करवाएंगे। शीतला माता ने जैसे उन दोनों बहुओं पर अपनी कृपा दृष्टि रखी वैसी हर किसी पर रखें।

जगत−जननी पार्वती ने एक भूखे भक्त को श्मशान में चिता के अंगारों पर रोटी सेंकते देखा तो उनका कलेजा मुँह को आ गया।वह दौड़ी−...
06/03/2026

जगत−जननी पार्वती ने एक भूखे भक्त को श्मशान में चिता के अंगारों पर रोटी सेंकते देखा तो उनका कलेजा मुँह को आ गया।

वह दौड़ी−दौड़ी ओघड़दानी शंकर के पास गयीं और कहने लगीं−"भगवन्! मुझे ऐसा लगता है कि आपका कठोर हृदय अपने अनन्य भक्तों की दुर्दशा देखकर भी नहीं पसीजता।

महादेव ने हँसते हुए कहा- "शुभे! ऐसे भक्तों के लिए मेरा द्वार सदैव खुला रहता है। पर वह आना ही कहाँ चाहते हैं यदि कोई वस्तु दी भी जाये तो उसे स्वीकार नहीं करते। कष्ट उठाते रहते हैं फिर ऐसी स्थिति में तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं?"

माँ भवानी अचरज से बोलीं- "तो क्या आपके भक्तों को उद्रपूर्ति के लिए भोजन को आवश्यकता भी अनुभव नहीं होती?"

श्री शिव जी ने कहा- "परीक्षा लेने की तो तुम्हारी पुरानी आदत है यदि विश्वास न हो तो तुम स्वयं ही जाकर क्यों न पूछ लो। परन्तु परीक्षा में सावधानी रखने की आवश्यकता है।"

भगवान शंकर के आदेश को देर थी कि माँ पार्वती भिखारिन का छद्मवेश बनाकर भर्तृहरि के पास पहुँचीं और बोली- "बेटा! मैं पिछले कई दिन से भूखी हूँ। क्या मुझे भी कुछ खाने को देगा?"

भिखारिन ने दीन भाव से निवेदन किया- "बेटा! इन दो रोटियों से कैसे काम चलेगा? मैं अपने परिवार में अकेली नहीं हूँ एक बुड्ढा पति भी है उसे भी कई दिन से खाने को नहीं मिला है।"

भर्तृहरि ने वे दोनों रोटियाँ भी भिखारिन के हाथ पर रख दीं। उन्हें बड़ा सन्तोष था कि इस भोजन से मुझसे से भी अधिक भूखे प्राणियों का निर्वाह हो सकेगा। उन्होंने कमण्डल उठाकर पानी पिया। सन्तोष की साँस ली और वहाँ से उठकर जाने लगे।

तभी आवाज सुनाई दी- "वत्स! तुम कहाँ जा रहे हो?"

भर्तृहरि ने पीछे मुड़ कर देखा। माता पार्वती दर्शन देने के लिए पधारी हैं।

माता बोलीं- "मैं तुम्हारी साधना से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें जो वरदान माँगना हो माँगो।"

प्रणाम करते हुए भर्तृहरि ने कहा- "अभी तो अपनी और अपने पति की क्षुधा शाँत करने हेतु मुझसे रोटियाँ माँगकर ले गई थीं। जो स्वयं दूसरों के सम्मुख हाथ फैला कर अपना पेट भरता है वह क्या दे सकेगा। ऐसे भिखारी से मैं क्या माँगू।"

पार्वती जी ने अपना असली स्वरूप दिखाया और कहा- "मैं सर्वशक्ति मान हूँ। तुम्हारी परदुःख कातरता से बहुत प्रसन्न हूँ जो चाहो सो वर माँगो।"

भर्तृहरि ने श्रद्धा पूर्वक जगदम्बा के चरणों में शिर झुकाया और कहा- "यदि आप प्रसन्न हैं तो यह वर दें कि जो कुछ मुझे मिले उसे दीन−दुखियों के लिए लगाता रहे और अभावग्रस्त स्थिति में बिना मन को विचलित किये शान्त पूर्वक रह सकूँ।"

पार्वती जी 'एवमस्तु' कहकर भगवान् शिव के पास लौट गई।

त्रिकालदर्शी शम्भु यह सब देख रहे थे उन्होंने मुसकराते हुए कहा- "भद्रे, मेरे भक्त इसलिए दरिद्र नहीं रहते कि उन्हें कुछ मिलता नहीं है।

परंतु भक्ति के साथ जुड़ी उदारता उनसे अधिकाधिक दान कराती रहती हैं और वे खाली हाथ रहकर भी विपुल सम्पत्तिवानों से अधिक सन्तुष्ट बने रहते है।"

 #युवाओं को मेरी सलाह है ,1. अपनी यौ@न इच्छाओं पर नियंत्रण ही आपकी सफलता या असफलता का कारण होगा।2. पोर्न और हस्त@मैथुन स...
03/03/2026

#युवाओं को मेरी सलाह है ,
1. अपनी यौ@न इच्छाओं पर नियंत्रण ही आपकी सफलता या असफलता का कारण होगा।
2. पोर्न और हस्त@मैथुन सफलता का सबसे बड़ा हत्यारा है। यह आपके मस्तिष्क को अवरुद्ध और नष्ट कर देता है।
3. ऊँट की तरह शराब पीने से बचें। अपने होश खोने और मूर्ख बनने से बुरा कुछ नहीं है।
4. अपने मानक ऊँचे रखें और किसी चीज़ से सिर्फ़ इसलिए संतुष्ट न हों कि वह उपलब्ध है।
5. अगर आपको कोई आपसे ज़्यादा होशियार मिले, तो उसके साथ काम करें, प्रतिस्पर्धा न करें।
6. कोई भी आपकी समस्याओं को बचाने नहीं आ रहा है। आपके जीवन की 100% ज़िम्मेदारी आपकी है।
7. आपको ऐसे लोगों से सलाह नहीं लेनी चाहिए जो जीवन में उस मुकाम पर नहीं हैं जहाँ आप पहुँचना चाहते हैं।
8. पैसे कमाने के नए तरीके खोजें। पैसे कमाएँ और उन मज़ाक करने वालों को नज़रअंदाज़ करें जो आपका मज़ाक उड़ाते हैं।
9. आपको 100 सेल्फ़-हेल्प किताबों की ज़रूरत नहीं है, आपको बस कार्रवाई और आत्म-अनुशासन की ज़रूरत है। अनुशासित रहें!
10. नशीली दवाओं से बचें। खरपतवार से बचें।
11. YouTube पर कौशल सीखें, नेटफ्लिक्स पर घटिया सामग्री देखने में अपना समय बर्बाद न करें।
12. कोई भी आपकी परवाह नहीं करता। इसलिए शर्मीलेपन को छोड़ें, बाहर जाएँ और अपने लिए अवसर बनाएँ।
13. आराम सबसे बुरी लत है और अवसाद का सस्ता टिकट है।
14. अपने परिवार को प्राथमिकता दें। भले ही वे बदबूदार हों, भले ही वे मूर्ख हों, उनका बचाव करें। उनकी मजबूरी , भेद को छिपाएँ।
15. नए अवसर खोजें और अपने से आगे के लोगों से सीखें।
16. किसी पर भरोसा न करें। किसी एक पर भी नहीं, चाहे आपको कितना भी प्रलोभन क्यों न दिया जाए। खुद पर विश्वास रखें।
17. चमत्कार होने का इंतज़ार न करें। हाँ, आप हमेशा अकेले नहीं कर सकते, लेकिन लोगों की राय न सुनें।
18. कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प आपको कुछ भी हासिल करा सकता है। खुद को विनम्र बनाना ही आपको ऊँचा उठाता है।
19. खुद को खोजने का इंतज़ार करना बंद करें। इसके बजाय खुद को बनाएँ।
20. दुनिया आपके लिए धीमी नहीं होगी।
21. कोई भी आपका कुछ भी कर्जदार नहीं है।
22. जीवन एक एकल खिलाड़ी का खेल है। आप अकेले पैदा हुए हैं। आप अकेले मरने वाले हैं। आपकी सभी व्याख्याएँ अकेले हैं। आप तीन पीढ़ियों में चले गए हैं और किसी को परवाह नहीं है। आपके आने से पहले, किसी को परवाह नहीं थी। यह सब एकल खिलाड़ी है।
23. आपका जीवन पथ इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि आप हर समय ज़रूरतमंद, उदास और कमज़ोर महसूस करते हैं। और केवल एक ही रास्ता है, जो बाहर निकलने का फैसला करना है। आपके अलावा कोई भी खुद को और अपने प्रियजनों को नहीं बचा सकता।
24. हर किसी का दिल आपके जैसा नहीं होता। हर कोई आपके साथ उतना ईमानदार नहीं होता जितना आप उनके साथ हैं। आप ऐसे लोगों से मिलेंगे जो आपको अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करेंगे और फिर अपने जीवन का वह हिस्सा बीत जाने और संतुष्ट होने के बाद आपको त्याग देंगे। जागते रहें।
25. 25 वर्ष की आयु तक, आपको इतना समझदार हो जाना चाहिए कि:
→दूसरों की सफलता का जश्न मनाएँ
→ईर्ष्या और जलन से बचें
→खुले दिमाग रखें
→अनुमान लगाने से बचें
→इरादे से काम करें
→कृतज्ञता का अभ्यास करें
→ईमानदारी से बोलें
→रोज़ाना व्यायाम करें
→गपशप से बचें
→स्वच्छ भोजन करें
→माफ़ करें
→सुनें
→सीखें
→प्यार करें

रात 11 बजे, ठंड में, छत पर पड़ोसी की वाईफाई चुराता, थर्मोडायनैमिक्स पढ़नेआज वो आईआईटी दिल्ली में हैमुंबई। लोकमान्य तिलक ...
03/03/2026

रात 11 बजे, ठंड में, छत पर
पड़ोसी की वाईफाई चुराता, थर्मोडायनैमिक्स पढ़ने
आज वो आईआईटी दिल्ली में है

मुंबई। लोकमान्य तिलक नगर।

एक झुग्गी है।
हजारों झोपड़ियां।

गलियां इतनी संकरी —
कि दो लोग साथ नहीं निकल सकते।

और उन्हीं गलियों में —

हराड चाल।
सामूदायिक बाथरूम पर लंबी लाइन
वो सारी मशक्कतें जो झुग्गियों में आम होती हैं

छोटी सी जमीन पर
एक 10x10 फीट का कमरा।
अभिषेक सुजीत शर्मा का घर।

चार लोग इस कमरे में रहते हैं।

अभिषेक।

माँ-बाप।

छोटी बहन।

एक बिस्तर।
चार लोग।

और हर रात —
माँ-बाप —
फ़र्श पर सोते हैं।

ताकि अभिषेक को वो बिस्तर मिले —

जिस पर वो किताब रखकर पढ़ सके।

चाणक्य ने कहा था —

"विद्या ही सबसे बड़ा धन है।
क्योंकि यह न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है।"

और अभिषेक के पिता —

स्टील की दुकान में सहायक।

वेतन — ₹10,000 महीना।

उसी पूरा परिवार चलता है।

उधार भी है।

2020 कोविडकाल। लॉकडाउन।

पूरी दुनिया घरों में बंद।

ऑनलाइन क्लासेज शुरू हुईं।

और अभिषेक के सामने —

पहली बड़ी समस्या आई।

इंटरनेट नहीं था।
मोबाइल डेटा की सीमा थी।

जेईई के लेक्चर्स देखने होते थे।

नोट्स उतारने थे।

टेस्ट्स देने थे।

मोबाइल डेटा जल्द ही खत्म हो जाता।

तो अभिषेक ने —
पास की एक इमारत में वाईफाई
जिसका कनेक्शन छत पर आता था
रात को स्पीड भी मिलता था
इमारत के अंदर बैठा उसी का हमउम्र
नेटफ्लिक्स पर वेब सीरीज देखने में व्यस्त होता था
यह लड़का उसी वाईफाई को चुरा कर
थर्मोडायनैमिक्स ऑर्गैनिक केमिस्ट्री, कैल्कूलस
पढ़ने को कोशिश
खुले आसमान के नीचे।

कभी ठंड से लड़ाई।
कभी बारिश का बाधा।

लेकिन अभिषेक रुकता नहीं।

क्योंकि उसे पता था —
यह चोरी का वाईफाई—

उसके भविष्य की चाबी है।

मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा था —

"हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले।"

लेकिन अभिषेक को —
ख़्वाहिश करने का वक़्त नहीं था।

उसे तो बस — जीना था।

2021। जेईई की तैयारी।

कोचिंग की फीस
₹2-2.5 लाख सालाना।

पिता की सैलरी— ₹10,000/प्रतिमाह।

मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन था

तो अभिषेक ने —
एक ऑनलाईन ट्यूशन ज्वाइन किया।
फीस 5,000/ सालाना।

और रात 11 बजे —
छत पर —
अध्यापकों के वीडियो से नोट्स बनाए
धीरे-धीरे —
कॉन्फिडेंस आने लगा।
मैं भी कर सकता हूं।

हर रात यही सिलसिला।
करीब 2-3 साल।
अभिषेक — बिस्तर पर।
किताबें फैली हुईं।
मां-बाप — फ़र्श पर।
किसी को कोई शिकायत नहीं।
एक ख़ामोश क़ुर्बानी।
---
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा —
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

(अधिकार सिर्फ कर्म पर है, फल पर नहीं।)

और अभिषेक के माता-पिता —
यही कर रहे थे।

फल की फिक्र नहीं।

बस — कर्म।

जून 2024। छत पर। फोन में रिजल्ट
पेज लोड हो रहा है।
दिल धड़क रहा है।

और फिर —

ऑल इंडिया रैंक: 2456

ओबीसी रैंक: 415

आईआईटी दिल्ली में सीट कंफर्म

अभिषेक रोने लगा।

फिर भागा — नीचे।

"हो गया। आईआईटी दिल्ली।"

बस इतना।

पूरी ज़िंदगी बदल गई।

मां-पिता भी रोए।

पय ये जीत के आंसू थे।

ऑनलाइन कक्षा वाले शिक्षक
को जब पता चला —

तो वो ख़ुद मुंबई आए।

उस 10x10 के कमरे में।

कैमरा, मीडिया — सब था।
फिजिक्सवाला के अलख सर
फ़र्श पर बैठे।
खाना खाया।
और फिर ऐलान किया —
"₹6 लाख की स्कॉलरशिप।

आईआईटी की पूरी फीस
होस्टल किताबें। सब कुछ।"

अभिषेक के पिता —
हाथ जोड़कर रोए।

अब क़र्ज़ नहीं लेना पड़ेगा।

मेरी बेटी ज्ञानवी जो कक्षा 2 में है
उसकी परीक्षा को लेकर भी—
मेरी पत्नी टेंशन में है —
तो आज स्कूल से जब वह लौटी
तो अभिषेक की कहानी सुनाई।
पढ़ाई करने का जुनून उसे समझाया
कि अभिषेक ने लिमिटेशंस का बहाना नहीं बनाया।
एसी या वाईफाई की जिद नहीं की

स्कॉलरशिप तो बाद में आई।
पहले — मेहनत आई।"

सवाल यह है —
तुम्हारे पास जो है —
उससे तुम क्या कर रहे हो।

आज अभिषेक —आईआईटी दिल्ली में।
पढ़ रहा है।
होस्टल के रूम में —
अब अपना वाईफाई है।
अभिषेक यहां से पढ़ाई पूरी कर
बड़े पैकेज की नौकरी पा लेगा
परिवार की आर्थिक स्थिति भी सुधर जाएगी

जब स्थिति बदलेगी
फिर रुक कर सोचेंगे
अभिषेक —झुग्गियों के बीच एक छोटे कमरे में रहता था।

फिर भी IIT किया।

अभिषेक —वाई फाई चुराता था।
रील्स देखने या गेम खेलने के लिए नहीं
पढ़ने के लिए।

उसने संसाधनों की कमी के बावजूद
हार नहीं मानी।

अधिकतर विद्यार्थी ऐसे हैं
जिनके पास —

इंटरनेट। अपना रूम। एसी। कोचिंग।
सब है
फिर भी पेरेंट्स से डिमांड्स शिकायतें करते हैं

सिलेबल ज्यादा है।"
सवाल मुश्किल हैं।"
"कंपटीशन टफ है।"
सच यह है —

अभिषेक के सामने भी ये चुनौतियां थीं।
लेकिन भूख ज़्यादा थी।

अब मैं आपको इस पूरी कहानी के
सबसे महत्वपूर्ण पराव पर लेकर आ गया हूं।
इसके बाद से पढ़ना बहुत जरूरी है

कि समस्या संसाधनों में नहीं।
प्रॉब्लम—माइंडसेट में है।

मैं 38 साल का हूं।
मैंने भी यूपीएससी ट्राई किया था।

संसाधन थे। किताबें थी। सपोर्ट भी था।
लेकिन क्लियर नहीं हुआ।

क्यों?
क्योंकि मुझमें वो भूख नहीं थी।
मैं कंफर्टेबल था।
और कंफर्ट— भूख को मार देती है।
मैं भी एक्सक्यूजेज बना रहा था।

आज एक अभिभावक के तौर पर
मनोवैज्ञानिक कैरल ड्वेक के 'ग्रोथ माइंडसेट'
के आधार पर —
कहूंगा-

संसाधन (Resources) नहीं, संकल्प Resourcefulness खोजें।
वाईफाई नहीं था — अभिषेक छत पर गया।
अगर तुम्हारे पास किताब नहीं है —
तो रोने के बजाय —
इंटरनेट या दोस्तों का सही इस्तेमाल करो।
बहाने बनाना बंद करो।
"मेरे पास अच्छे कपड़े नहीं।"
"मेरा कमरा छोटा है।"
यह सब 'फिक्स्ड माइंडसेट' की निशानियां हैं।
जो लोग इतिहास रचते हैं —
वे अपनी कमियों को ढाल नहीं बनाते।

समाज कहता है —
"कुछ लोग पैदाइशी जीनियस होते हैं।"
यह झूठ है।
सफलता सिर्फ़ और सिर्फ —
निरंतर प्रयास से मिलती है।

अभिभावकों के लिए
अभिषेक के पेरेंट्स ज़मीन पर सोए।
यह बलिदान था।
बच्चों को हर वक़्त —
महंगे गैजेट्स या आलीशान कमरों की ज़रूरत नहीं।
उन्हें आपके मौन समर्थन की ज़रूरत है —
जो एहसास दिलाए — "हम तुम्हारे साथ हैं।"

शर्तों वाला प्यार न दें।
कभी भी बच्चों को यह महसूस न कराओ —
कि आप उन्हें तभी प्यार करोगे जब वे सफल होंगे।
उन्हें अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए प्रेरित करो —
रैंक का दबाव डालकर उन्हें तोड़ें नहीं।

जीवन एक परीक्षा है —
जहां प्रश्नपत्र पहले से तय नहीं होता।
अभिषेक शर्मा ने साबित कर दिया —
कि अगर तुममें कुछ कर गुज़रने की आग है —

तो दुनिया की कोई झुग्गी —
कोई आर्थिक तंगी —
तुम्हें आईआईटी के गेट तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।

असली सफलता —
सिर्फ़ अपना जीवन बदलना नहीं।
असली सफलता —
अपने संघर्ष को याद रखकर —
ज़मीन से जुड़े रहना है।

आखिर में खुद से सवाल करें
क्या आप अपनी परिस्थितियों के ग़ुलाम हो —
या अपने भविष्य के निर्माता?

यह कहानी हर बच्चे और उनके अभिभावक तक पहुंचे
जो भी बच्चा आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रहा है।

ताकि उसे पता चले —
आईआईटी— अमीरों का मोनोपोली नहीं।
हर उसके लिए है —
जो कोशिश करने को तैयार है।

प्रीपेड मृत्युपुणे के एक बड़े श्मशान घाट में दोपहर के 3 बजे थे।‘रोहन’ (उम्र 35 वर्ष),जो अमेरिका की एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंप...
24/02/2026

प्रीपेड मृत्यु
पुणे के एक बड़े श्मशान घाट में दोपहर के 3 बजे थे।
‘रोहन’ (उम्र 35 वर्ष),
जो अमेरिका की एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था,
अभी-अभी फ्लाइट से उतरकर सीधे श्मशान घाट पहुँचा था।
उसके पिता,
‘सदाशिवराव’ (उम्र 75 वर्ष),
कल रात गुजर गए थे।
रोहन के हाथ में महंगा लैपटॉप बैग था और आँखों पर रेबैन का चश्मा।
उसे पसीना आ रहा था और वह बार-बार घड़ी देख रहा था।
वहाँ ‘मोक्ष इवेंट मैनेजमेंट’ (अंतिम संस्कार करने वाली एजेंसी) का कर्मचारी
‘सुमित’ खड़ा था।
सुमित ने सारी तैयारी कर रखी थी।
लकड़ियाँ सजा दी थीं,
पंडित बुला लिया था, और सदाशिवराव के पार्थिव शरीर को स्नान कराकर तैयार रखा था।
रोहन आया।
उसने पिता के चेहरे की ओर एक नजर डाली।
आँखों से एक-दो आँसू निकल आए।
उसने सुमित से पूछा:
“मिस्टर सुमित,
सब तैयार है ना?
मुझे 6 बजे की रिटर्न फ्लाइट पकड़नी है।
कल मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है।
प्लीज़ जल्दी कराइए।”
सुमित को आश्चर्य हुआ।
जिस पिता ने इस बेटे को पाल-पोशकर बड़ा किया,
उस पिता की चिता के पास रुकने के लिए इस बेटे के पास तीन घंटे भी नहीं थे।
सुमित ने शांत होकर सिर हिलाया।
विधि पूरी हुई।
रोहन ने मुखाग्नि दी।
धुएँ के गुबार आसमान में उठ गए।
रोहन ने सुमित को अलग ले जाकर चेकबुक निकाली।
“सुमित, धन्यवाद।
आपने अच्छी व्यवस्था की।
आपका बिल कितना हुआ? 50 हजार? 1 लाख?
राशि बताइए,
मैं अभी चेक दे देता हूँ।
मैं दोबारा नहीं आ पाऊँगा,
अस्थि विसर्जन भी आप ही करवा दीजिए।”
सुमित ने रोहन की ओर देखा।
उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी।
उसने जेब से एक पुरानी फाइल निकाली और रोहन के हाथ में दी।
“साहब, बिल देने की जरूरत नहीं है।
आपका बिल ‘पेड’ है।”
रोहन चौंक गया।
“पेड?
किसने भरा पैसा?
क्या मेरे चाचा ने?”
सुमित बोला:
“नहीं साहब।
पाँच साल पहले सदाशिवराव जी (आपके पिता) हमारे ऑफिस आए थे।
वे बहुत बीमार थे, ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे।
उन्होंने मुझसे पूछा था —
‘आपका पैकेज क्या है?
मेरे बेटे को तकलीफ न हो, सब इंतज़ाम कर देंगे ना?’
हमने उन्हें पैकेज बताया।
उन्होंने उसी दिन 50,000 रुपये एडवांस जमा कर दिए थे।
और यह ‘चिट्ठी’ मुझे देकर कहा था —
‘मेरा बेटा आए तो उसे यह दे देना।
और अगर वह न आ सके,
तो आप ही मेरा अंतिम संस्कार कर देना।’”
सुमित ने वह चिट्ठी रोहन को दी।
रोहन ने काँपते हाथों से चिट्ठी खोली।
उसमें सदाशिवराव के काँपते अक्षरों में लिखा था:
“प्रिय रोहन,
बेटा,
मुझे पता है तुम बहुत व्यस्त हो।
अमेरिका में तुम्हें साँस लेने की भी फुर्सत नहीं होती।
मुझे मालूम है कि
मेरी मृत्यु की खबर सुनकर तुम्हें चिंता होगी।
‘छुट्टी मिलेगी या नहीं?
टिकट मिलेगा या नहीं?
मीटिंग का क्या होगा?’
ये सवाल तुम्हारे मन में आएँगे।
बेटा, तुम्हारा समय और तुम्हारा करियर बहुत महत्वपूर्ण है।
मैंने तुम्हें इसलिए पाला है कि तुम दुनिया जीत सको।
एक बूढ़े की लाश के लिए तुम अपना नुकसान मत करना।
इसलिए मैंने अपनी मृत्यु की व्यवस्था पहले ही कर दी है।
एजेंसी को पैसे दे दिए हैं।
वे सब कर देंगे।
तुम आ सको तो अच्छा है,
न आ सको तो भी मुझे कोई शिकायत नहीं।
बस एक विनती है —
जब मैं तुम्हें बचपन में स्कूल छोड़ने जाता था,
तो तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ा था।
आज जब तुम मुझे अग्नि दो,
तो तुम्हारा हाथ काँपना नहीं चाहिए।
जल्दी वापस चले जाना।
तुम्हारी पत्नी इंतज़ार कर रही होगी।
तुम्हारा,
पापा।”
चिट्ठी पढ़ते ही रोहन के हाथ से चेकबुक कीचड़ में गिर गई।
उस श्मशान में,
जहाँ लकड़ियों के जलने की आवाज आ रही थी…
वहाँ अब रोहन का अहंकार और करियर का घमंड जलकर राख हो चुका था।
वह घुटनों के बल बैठ गया।
चिल्लाया —
“पापा…!! मुझे माफ कर दीजिए!”
उसने सुमित के पैर पकड़ लिए।
“सुमित,
मुझे अमेरिका नहीं जाना।
मुझे अपने पापा के साथ रहना है!
मैंने करोड़ों रुपये कमाए,
पर मैं तो असली भिखारी निकला!
मेरे पापा ने मरते समय भी मेरी मीटिंग की चिंता की…
और मैं उनके अंतिम दर्शन का भी हिसाब लगा रहा था?”
उस दिन रोहन फ्लाइट नहीं पकड़ सका।
वह वहीं,
जलती चिता के सामने रात भर बैठा रहा।
क्योंकि उसे समझ आ गया था —
‘प्री-पेड’ सिर्फ सिम कार्ड हो सकता है,
पिता का प्रेम नहीं।
पिता का प्रेम ‘अनलिमिटेड’ होता है,
और उसकी कीमत दुनिया की कोई भी करंसी नहीं चुका सकती।
आप दुनिया में कितने भी बड़े बन जाएँ,
कितना भी पैसा कमा लें…
लेकिन जिन माता-पिता ने आपका बचपन सँवारा,
उनके अंतिम सफर में साथ देने से कभी पीछे मत हटिए।
एजेंसी अंतिम संस्कार कर सकती है,
लेकिन आँसू एजेंसी के नहीं होते —
वे अपने खून के रिश्तों के ही होते हैं।
Father’s Day केवल एक दिन का नहीं होता…

उधर वो हाथों के पत्थर बदलते रहते हैं इधर भी अहल-ए-जुनूँ सर बदलते रहते हैं बदलते रहते हैं पोशाक दुश्मन-ए-जानी मगर जो दोस्...
19/02/2026

उधर वो हाथों के पत्थर बदलते रहते हैं
इधर भी अहल-ए-जुनूँ सर बदलते रहते हैं

बदलते रहते हैं पोशाक दुश्मन-ए-जानी
मगर जो दोस्त हैं पैकर बदलते रहते हैं

हम एक बार जो बदले तो आप रूठ गए
मगर जनाब तो अक्सर बदलते रहते हैं

ये दबदबा ये हुकूमत ये नश्शा-ए-दौलत
किराया-दार हैं सब घर बदलते रहते हैं

बेकल उत्साही

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Jammu

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09646364956

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